28.8.15

Like the wild grass


don’t save me
as I run through this vast meadow
facing the horizon
with my eyes closed

In these empty lands I meander
calling upon the moment
where the tangerine sky
meets the grey of infinity

where
you–

see me
like the burning sun
which glazes my skin
leaving an imprint of its gaze

hold me
like the ground
which doesn't shake
when I move

love me
like the sea
with enveloping waves
always throwing me off balance

meet me
where my feet are planted
like grass
harbouring the falling dew

think of me
as nothing more or less
than a song
especially written for you


and let me fall back
to the ground

as I am not
like the wild wind
sweeping you off your feet

I am like the wild grass
which grows anywhere

and except holding the soil

offers nothing

7.8.15

what's left of us

I found remains of us
in the visa bill of our last dinner together
it is one of the things
that's left
of us

I scanned it carefully
memorizing what you and I ordered
remembering its taste
as if there was something in the detail
tooth picking my heart's cavity
as if it was the first of the last from
what's left of us

I will plant the bill carefully
in the files of us
with everything else
hoping to find it again
like those flowers I kept
in my books
always finding them again
with their colour changed

in the fading mirrors
of our sea
where like a receding hairline
the water retreated into a mirage
leaving only a few broken shells
always changing form
blurring the remains of us

there is no adjustment possible
from what we thought would be
as what's left of us
is also the ever after frame
carpentered by the high tide
of the excesses of us

From the oozing molasses of my heart
there will be sunshine soon
bursting into perhaps a honeysuckle

which i will water
hoping maybe that someday
there would be more than just an empty shore
that's left of us
where
you and I
will no longer be
us





21.6.15

Untitled



वो किताब बार बार एक ही पन्ने पर खुल कर
टकटकी लगाए, इंतेज़ार करती रहती है
खिड़की से हवा के आते ही
मानो वो किताब का हर पन्ना
उस एक बदनाम पन्ने को धकेल कर
छत ताकने पर मजबूर करे बिना नही मानता

पर उस पन्ने को कोई याद नही रखना चाहता
उसके कान मोड़ कर
कोई बुकमार्क भी नही करना चाहता

मानो की, उस पन्ने को कोई तभी पढ़ना चाह सकता है
जब वो अपने आप खुल के आँखों के सामने आ बैठे

17.6.15

मोज़ाइयिक सी चाहना

जिस तरह मैं अपने पुराने घर में बसी हुई हूँ  
कई घर बदलने के बाद
(आज भी सपनों में मुझे
अपना पुराने वाला घर ही दिखता है)
तुम कुछ उसी तरह मुझ में बसे हो
अब तुम यहाँ रहो या ना रहो
बसे तो तुम हो यहाँ
थोड़े ही से सही

तुम्हारे गालों के गड्ढे
इसकी दीवारों में आलें बने बैठे हैं
तुम्हारी खुश्बू सीलन की तरह मेरे
टीबी के बाद के बचे कुचे फेफड़ों पे हावी है
तुम्हारा गुस्सा छत से पपड़ी की तरह  
धीरे धीरे मुझ पे टपकता ही रहता है

घर में सिर्फ़ तुम ही नही
और भी लोग तहख़ाने में जमे बैठे है
कोई दीमक सा मेरी पुरानी क़िताबे पचा रहा है
कोई अलमारी के उपर की धूल में छिपकली जैसा छुपा है
तो कोई मेरे कपड़ों पर कलफ़ की तरह कड़क सा लगा बैठा है

सोफे के पीछे के वो सिर के तेल के निशानो के पीलेपन से
लंबाई नापने वाले इंचों के आगे के नामो से
और पुराने कलेंडर वाली कील से
जिसपे एप्रिल अभी भी लाल है
पुत जाएँगे सब तुम्हारे जाने से
इन्ही से घर वाइट वॉश चाह रहा है

सब सफेद हो जाएगा, नये जैसा
और हो जाएगा नया, वो पुराना फर्श भी
जिसपे हम गर्मियों में चटाई बिछा कर सो जाते थे
घिसाई के बाद उसपे, पाउडर डाल कर
मैं बिना स्केट्स के ही इधर से उधर फिसलूंगी

पर फिर भी मुझे पता है
जब मैं कभी अपने ख़यालों में  
कॅमोड पे बैठे ताक रही होंगी
तुम मिलोगे उस मोज़ाइयिक फर्श पे
किसी एक धब्बे में अपनी जीब चिड़ाते हुए
और मैं हमेशा की तरह हंसकर झल्लाओंगी


बस शायद यही यह घर चाह रहा है

29.5.15

Untitled...

शब्दों को मरोड़  कर
उनका सत् निकाल कर
गड्ड गड्ड पीया जा सकता है

छाननी में छूटे हुए
फूस की तरह पड़े शब्दों को
ग्रीटिंग कार्ड पे
रिसाइकल भी किया जा सकता है

उन्हे उबाल कर
नींबू से फाड़ कर
समय और तापमान का सही तालमेल बैठा कर
दही भी जमाया जा सकता है

पर मैं चाहती हूँ कुछ ऐसा
जैसे दही में चीनी मिला दी हो
की शब्दों की तासीर ही बदल जाए

नेरूदा के चेररी ब्लॉसम के पेड़ के साथ
बसंत की छेड़खानी की तरह
या एलीयट के आते जाते 
माइकलएंजेलो की बात करते लोगों की तरह 
ऐसे शब्द जिनको कह देने के बाद 
कुछ असर दिखे
बस नापा ना जा सके


मेरी दादी के बड़े पेट की तरह
जो मेरी बहन और मेरे बीच बँटता
लिपट जाते हम
एक तरफ मैं तो दूसरी तरफ वो 

पर मेरी दादी के पेट का शब्दों से क्या करना
उसकी गुड गुड आवाज़ में थोड़े ना कोई रस या अलंकार छुपे थे
पर चार फीट की खाट पे
मेरी दादी, उनका पेट और हम दोनो,
ऐसे फिट हो जाते

जैसे कुछ शब्द, कविता में हो जाते हैं



14.9.14

Beyond the Plateaus

I flock from one plateau to another
making each one home
to the ideas
birthing in my head
at the rate of
plural lives per second
nurturing them with love
like potted plants
only  to be abandoned
when inconvenient
while I convalesce
from the nothingness
into another abyss
full of plateaus
hoping to reach
the place I belong
but have never been to
and may never reach
but am familiar with
the taste of tomatoes
that grow there
on the land where it never rains
unable to clear the dust
settling on the bird song
that I know by heart
but forget.

9.9.14

सब कुछ के अलावा

उसे कुछ भी नही चाहिए था

मुट्ठी भर गेहूँ
वो चूयिंग गम की तरह
पूरा दिन चबा लेती
पर कभी कभी, सबके सो जाने के बाद भी,
उसकी आँखें खुली ही रहती

अक्सर अपने नाख़ून चबाते हुए
वो सब कुछ भूल जाती
मानो की वो कविता की एक पंक्ति में सही बैठ गयी हो
और मिल जाता उसे कुछ
ना कम ना ज़्यादा
जो उसकी डेस्क पे सजे डिब्बो में आराम से फिट हो जाता

तब उसे याद जाता की वो खुश है
और खुशी ऐसी की-- घंटी बजते ही,
नंगे पावं भाग कर दरवाज़ा खोल
अपने नाम की चिठ्ठी पाने जैसी,
जिसे पढ़ते ही आँख में आँसू जाए
तब वो अपने आप को बहुत दुखी पाती

और डिब्बो में रखा समान बढ़कर,
बाहर निकलने लगता
शतुरमुर्ग की तरह
वो अपना सिर उन्ही डिब्बो में छुपा लेती
और थोडा कम थोडा ज़्यादा
पा लेती वो कुछ

बल्ब के आसपास मंडराते पतंगे की
बेहूदा कोशिश से उसे घृणा होती
उसे दिन में ज़मीन पे पा वो गुस्से से झीँकती
जैसे पतंगा उसकी कुछ ना चाहने की कोशिस में भंग डालता हो
कभी कभी वो बल्ब ही बुझा देती

कुछ अपना बनाने के ख़ौफ़ से
उसे कुछ ना पाने का सुख बेहतर मालूम होता
कैंची से अपने स्कर्ट के सारे धागे काट
उसे फेला कर बिछा देती
की उसमे कुछ भी समेटा ना जाए

अपने हर जनम दिन की खुशी में
एक नया डिब्बा खोल वो डेस्क पे रख लेती
खाली ही
इस उमीद में की उसमे कुछ नही रखेगी
क्यूंकी उसे तो कुछ भी नही चाहिए

झील की जलपरी की तरह पानी के अंदर और बाहर फुदक कर
वो उनके बीच की जगह खोजती रहती
कभी कुछ मिल जाता उसे जब
वो फिर उपर आकर कुछ और खोज लेती

क्यूंकी उसे कुछ भी नही चाहिए
सब कुछ के अलावा



12.6.14

चाहना से

तुम्हारे कह देने की वजह से नही
बस समझो की तुम्हारे कह देने से
झूंझलाती हुई गयी मरी

यह कविता

एक सिरे से शुरू कर
तुम्हारे दूसरे सिरे तक जाने की
बेकार और बेमन कोशिश सी

ऊंघते हुए
तुम्हारे गालों के गड्ढे देख कर
मन ही मन मुस्काने के सुख सी साधारण

एक अजनबी को अपने
कुछ घूट पीए हुए
पानी के ग्लास से पानी दे देने जैसी अजीब

बिल्कुल एक सी इच्छाओं
और सीरतो जैसी
एकदम आसान

पर दो पूर्णतः अलग लोगों के बीच
बिना कोई उम्मीद जगाने वाली
उस अनकही बात सी अंजान

कभी ना मिलने वाली लकीरों की तरह
शुरू ही ख़तम से होने वाली
हताश रातों की फिराक़ जैसी मामूली

लू के थपेड़ो में आँधी की आहत
और भीड़ में गुम कर देने जैसी
आम उपमाओ में लिपि पूती

उन सभी घंटों के समूह में छुपी हुई
नादानजिनके हर कोने में तुम्हे सही बैठाने
की ताक बसती है

अब क्या यह कहूँ की तुम
अपनी जगह बनाते हुए
पसर ही गये, या फिर,

ये की मुझे नही पता
उस एक सिरे से दूसरे पर
कहाँ तुम शुरू और मैं ख़तम हो जाती हूँ

उफ्फ तो भुग्तो

क्यूंकी ऐसी सी ही बनती है
एक कविता तुम्हारे कहने की
मासूम चाहना से

उस जगह

उस जगह

कभी कभी तुम्हारे कंधों पे सर रख कर
मैं पहुच जाती हूँ कहीं
एक जगह, जहाँ शायद तुम भी नही होते

ऐसा मैं सिर्फ़ तुम्हारे साथ ही कर पाती हूँ
जब मैं खाम्मखाँ अपने आप को
उस जगह पाती हूँ, जिसके बारे में मैने कभी सोचा ही नहीं

वहाँ जाने का कोई मकसद या फाय्दा नहीं है
सिर्फ़ अमल्तस के पीले फूलों को देख कर
वहाँ शाम गुज़ारी जा सकती है

बिना घड़ी को सौ बार देखे
उस पेड़ के फूलों को झर कर
हरे पत्तों में बदलता हुआ देखा जा सकता है

पर यह बात रोमॅन्स की नही
एक तकनीकी सवाल की है

इस सब में तुम्हारे कंधों की क्या भूमिका है
यह तो में जानती ही नही

शायद सवाल यह नही है की
मैं अकेले वहाँ पहुच सकती थी या नही

सवाल आता है
बस इतनी सी बात से
की मुझे यह पता चल गया
ऐसी एक जगह है
जहाँ मुझे जाना बहुत पसंद है

जब वो हाइवे पर आगे से आने वाली गाड़ी की हेडलाइट
मुझे वापस ले आती है तुम्हारे कंधों पर
मैं सिर्फ़ इतना ही कह पाती हूँ
कुछ नही! ऐसे ही!


"क्या तुम्हे पता है,
मुझपे पीला रंग बहुत फबता है?"

और तुम मुस्कुरा कर सिर हिला देते हो
जैसे तुम हमेशा से जानते थे

और मैं तुम्हे कोस कर
मूह पलट के
फिर कंधे पे सिर रख लेती हूँ
इस उम्मीद में की शायद इस बार
पलाश हो

पर फूल तो पीले ही होते हैं उस जगह
जहाँ शायद तुम भी नही होते

पर पहुचती हूँ मैं सिर्फ़ तुम्हारे साथ